भगवान परशुराम का जीवन परिचय | Bhagwan Parshuram Biography In Hindi‌

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भगवान परशुराम किसी एक समाज विशेष के आदर्श नहीं है बल्कि वह संपूर्ण हिंदू समाज के हैं और वे एक चिरंजीवी हैं जय भगवान राम के काल में भी देखा गया और भगवान कृष्ण के समय में भी।

उन्होंने ही भगवान कृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था और ऐसा भी कहा जाता है कि वह कलिकाल के अंत में भी उपस्थित होंगे।

ऐसा भी माना जाता है कि वह कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्या रथ रहेंगे कई पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि महेंद्र गिरी पर्वत भगवान परशुराम के तक की जगह है जहां वह कल पान तब तक के लिए तपस्या रहा तो होने चले गए थे।

दोस्तों आज के अपने लेख भगवान परशुराम का जीवन परिचय (Bhagwan Parshuram Biography In Hindi) में आम आपको उनके बारे में बहुत सी जानकारियां देंगे तो आइए जानते हैं उनके बारे में-

भगवान परशुराम का जीवन परिचय | Bhagwan Parshuram Biography In Hindi‌

Table of Contents

परशुराम का जीवन परिचय

नाम (Name)भगवान परशुराम
अन्य नाम (Nick Name)अनंतर राम
जन्म (Date Of Birth)वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को
जन्म स्थान (Birth Place)ज्ञात नहीं
राशि (Zodiac Sine)ज्ञात नहीं
जाति (Cast)ब्राह्मण
पिता का नाम (Father’s Name)जमदग्नि
माता का नाम (Mother’s Name)रेणुका
दादा का नाम (Grandfather’s Name)ऋचीक
जयंती (Jayanti)अक्षय तृतीया के दिन

परशुराम कौन है? (Who Is Parshuram?)

भगवान परशुराम सप्तर्षियों में से एक ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पांचवें पुत्र और वीरता के साक्षात उदाहरण थे जिन्होंने भगवान श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र प्रदान किया था।

उनके बारे में ऐसी मान्यता है कि वह अमर है और त्रेता युग के दौरान भगवान राम तथा द्वापर युग के दौरान महाभारत में अहम भूमिका निभाई है। वह रामायण में सीता स्वयंवर में भगवान राम द्वारा शिवजी के पिनाक धनुष को तोड़ने पर सबसे अधिक क्रोधित हुए थे।

परशुराम जी के जन्म की मान्यताएं

भगवान परशुराम के जन्म के पीछे कई मान्यताएं एवं अनसुलझे सवाल है सभी की अलग-अलग राय एवं अलग-अलग विश्वास है-

ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम का जन्म वर्तमान के मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी के किनारे बसे महेश्वर में हुआ था।

मान्यता के अनुसार परशुरामजी के जन्म के पूर्व उनके माता पिता ने भगवान शिव की तपस्या की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें वरदान दिया और इसके बाद स्वयं विष्णु भगवान ने रेणुका के गर्भ में पांचवें पुत्र के रूप में इस धरती पर जन्म लिया और उनका नाम रामभद्र रखा गया।

इसके साथ ही भगवान परशुराम के अगले जन्म के पीछे भी बहुत दिलचस्प मान्यता है जिसमें ऐसा माना जाता है कि वह भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के रूप में एक बार फिर पृथ्वी पर अवतरित होंगे और हिंदु मान्यताओं के अनुसार यह भगवान विष्णु का धरती पर अंतिम अवतार होगा और इसी के साथ कलयुग की समाप्ति भी होगी।

भगवान परशुराम की शिक्षा (Parshuram Education)

भगवान परशुराम को उनकी पत्र भक्ति के लिए जाना जाता है और उनकी शिक्षा है कि माता-पिता का आदर सर्वोच्च है वह एक प्रकृति पोषण थे और प्रकृति का किसी भी प्रकार का विरोध करना में ईश्वर का विरोध मानते थे।

महिलाओं का सम्मान एक सद्पुरुष के लिए अनिवार्य गुण मानते थे और इसी वजह से अंबा का सम्मान लौटाने के लिए वह अपने सबसे प्रिय शिष्य भीम के साथ भी युद्ध करने को तैयार हो गए थे।

परशुराम का अर्थ क्या है? (What is Parshuram mean)

परशुराम दो शब्दों परशु और राम से मिलकर बना हुआ है जिनमें परशु का अर्थ है ‘कुल्हाड़ी’ इन दोनों शब्दों को मिलाने से जो अर्थ निकलता है वह है- “कुल्हाड़ी के साथ राम”

जिस प्रकार भगवान राम को विष्णु भगवान का अवतार माना जाता है उसी प्रकार परशुराम को भी विष्णु के अवतार के रूप में माना जाता है और वह भी उनकी तरह ही शक्तिशाली माने जाते हैं।

इसके अलावा भी परशुराम जी को रामभद्र, भार्गव, भृगुपति भृगुवंशी, जमदग्न्य आदि नामों से जाना जाता है।

भगवान परशुराम ने अपनी माता का वध क्यों किया?

भगवान परशुराम का जन्म भले ही ब्राह्मण कुल में हुआ हो लेकिन वह जन्म से ही क्षत्रिय गुणों वाले थे और एक बार की बात है जब उनके पिता यज्ञ में तल्लीन थे तो उनकी माता नदी से जल लेने के लिए गई थी।

वहां पर राजा चित्ररथ स्नान कर रहे थे जिन्हें देखकर उनकी माता रेणुका आस्कत हो गई और जब वह वापस आई तब उनके पिता जमदग्नि ने अपने तप की प्रभाव से अपनी पत्नी के कार्यों को जान लिया।

इसके बाद उन्होंने अपने पांचों पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया लेकिन किसी ने भी प्रेम वास माता का व्रत नहीं किया इसके बाद उन्होंने

भगवान परशुराम का जीवन परिचय | Bhagwan Parshuram Biography In Hindi‌

परशुराम जी को उनकी माता का वध करने का आदेश दिया और अपने पिता का आदेश पाकर उन्होंने तुरंत अपने पैसे से अपनी माता का गला काट दिया जिससे उनके पिता अपने पुत्र की आज्ञाकारीता से बहुत प्रसन्न हुए।

अपने पुत्र की आज्ञाकारिता प्रसन्न होकर जब उन्होंने परशुराम जी से वरदान मांगने को कहा तो भगवान परशुराम ने अपनी माता का जीवनदान मांग लिया जिससे उनके पिता ने अपनी पत्नी को पुनः जिंदा कर दिया।

परशुराम जी द्वारा 21 बार क्षत्रियों का विनाश

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एक समय की बात है जब माहिष्मती देश के राजा कार्तीवीर अर्जुन जोकि सहस्त्रार्जुन के नाम से जाने जाते हैं वह अपने सफर में जा रहे थे तो अपनी थकान के कारण ऋषि जमदग्नि जी के आश्रम में आश्रय लेने के लिए पहुंचे।

ऋषि जमदग्नि जी ने भी उनके विश्राम की उचित व्यवस्था की और देवराज इंद्र द्वारा प्राप्त कामधेनु गाय की कृपा से उन्होंने राजा सहित पूरी सेना को भोजन पानी आदि की व्यवस्था कर दी।

विशाल सेना और अन्य लोगों के अचानक से भोजन पानी की व्यवस्था से राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने इसके बारे में ऋषि जमदग्नि से पूछा तो उन्होंने यह सब माता कामधेनु की कृपा बताई।

इसके बाद लालच बस राजा ने ऋषि से वह गाय मांगी तो उसी ने उन्हें वह गाय देने से स्पष्ट मना कर दिया जिसके बाद उन्होंने अपने बल से उनसे कामधेनु गाय को ले लिया।

और जब यह बात परशुराम जी को पता चली तो वह अपने पिता के अपमान की बात सुनकर बहुत अधिक होते हुए और अपने पिता के अपमान का बदला लेने का प्रण किया।

अपने इसी प्रण को पूरा करने के लिए वह राजा काटते हुए थे के दरबार में पहुंच गए और उन्होंने अपने बरस की सहायता से सहस्त्रार्जुन के हजारों बंधुओं सहित उनके सर को धड़ से अलग कर दिया।

जिसके बाद अपने पिता का बदला लेने के लिए सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने धोखे से ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी जिनकी मृत्यु के वियोग में उनकी माता रेणुका ने भी अपने पति की चेतावनी में खुद को सति कर लिया।

इस पूरी घटना की जानकारी मिलने के बाद भगवान परशुराम बहुत ही क्रोधित हुए और उन्होंने फिर शायद अर्जुन के सभी पुत्रों के साथ पूरी पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियों से विहीन कर दिया।

परशुराम और भगवान गणेश का युद्ध (Parshuram And God Ganesh)

एक समय परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए उनके निवास स्थान गए थे उस समय भोलेनाथ अपनी ध्यान में मगन थे इस कारण उनके पुत्र गणेश ने परशुराम जी को अंदर जाने से रोका।

इस कारण परशुराम जी बहुत ज्यादा क्रोध में आ गए और उन्होंने भगवान गणेश युद्ध करना प्रारंभ कर दिया और अंत में उन्होंने अपने अस्त्र से उनके ऊपर आघात किया जिससे उनका एक दांत टूट गया इस घटना के बाद कयास भगवान को एकदम तक कहा जाने लगा।

ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान गणेश ने अपने उसी खंडेला से महर्षि वेदव्यास के साथ मिलकर महाभारत ग्रंथ की रचना की थी।

परशुरामजी की भगवान राम से भेंट (Parshuram Aur God Ram)

परशुराम जी की भगवान राम से भरत की कथा को वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों में बड़ी उदारता के साथ वर्णित किया गया है और साथ ही लक्ष्मण एवं परशुराम संवाद तो बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय है।

दरअसल यह हुआ कि जब महाराज जनक अपनी पुत्री सीता का स्वयंवर कर रहे थे तो उस दौरान उन्होंने धनुष भंग करने की शर्त रखी थी जिसे भगवान राम ने पूरा किया था।

इस प्रकार भगवान शिव के धनुष भांग के बारे में जानकारी भगवान परशुराम अति क्रोधित हो गए हैं तुरंत राजा जनक के दरबार में पहुंच गए और उन्हें चेतावनी दी कि वह जितने भी भगवान शिव का धनुष तोड़ा है उन्हें उनके सामने लाओ अन्यथा वह यहां उपस्थित सभी लोगों का वध कर देंगे।

इसके बाद वहां पर भगवान लक्ष्मण और परशुराम के बीच संवाद भी होता है जिसके कारण पर काम बहुत ज्यादा खुद में आ जाते हैं इसके बाद भगवान राम ने आगे बढ़कर परसराम जी से वार्तालाप किया और उनके क्रोध को शांत किया इस प्रकार परसराम समझ गए कि वह स्वयं भगवान विष्णु के अवतार के सामने खड़े हैं।

अपनी इस अनुभूति की पुष्टि करने के लिए भगवान परशुराम ने राम को विष्णु भगवान का गांडीव धनुष दिया और उसे स्नान करने को कहा इस पर भगवान राम ने उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई।

और महर्षि परशुराम से कहा कि आप यह तो जानते ही होंगे कि यह कोई आम धनुष नहीं है और इसका कोई भी वार खाली नहीं जाता है तो कृपया आप बताएं कि यह वार मैं कहां संधान करूं जिसके ऊपर भगवान परशुराम ने उनसे आग्रह किया कि वह उस वाण के माध्यम से उनके अहंकार को नष्ट कर दें।

भगवान परशुराम कहां हैं? (Where Is Parsuram?)

भगवान परशुराम की मृत्यु कैसे हुई? (Parshuram Death Reason)

भगवान राम ने भी ऐसा ही किया और इसके बाद परशुराम जी प्रसन्न मन से पुनः महेंद्र गिरी पर्वत पर निवास करने के लिए चले गए और वही अपने ध्यान में मग्न हो गए।

और ऐसी भी धार्मिक मान्यताएं हैं कि भगवान परशुराम जी को अमरता का वरदान प्राप्त है और वह आज भी उसी महेंद्र गिरी पर्वत पर निवास करते हैं।

भगवान परशुराम और कल्कि अवतार (Parshuram Aur God Kalki )

हिंदू पौराणिक मान्यताओं और कथाओं में ऐसा माना जाता है कि भगवान परशुराम जी कल की युग में भगवान विष्णु के अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

और जब भगवान विष्णु अपने दसवें अवतार कल्कि के रूप में इस पृथ्वी पर लेंगे तब भगवान परशुराम उनके शिष्य बनेंगे और उन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा देंगे।

परशुराम जी का महाभारत में योगदान

परशुराम जी ने कर्ण को श्राप क्यों दिया? (Parsuram Aur Karna)

दोस्तों महाभारत में भगवान परशुराम द्वारा बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया गया है और एक स्त्री के सम्मान की रक्षा करने के लिए अपने सबसे प्रिय शिष्य के साथ भी युद्ध किया ।

इसके साथ ही उन्होंने दानवीर कर्ण को शस्त्र विद्या भी सिखाई थी हालांकि परशुराम कभी भी क्षत्रियों को अपना ध्यान नहीं देते थे और वह केवल ब्राह्मणों को ही अपनी शिक्षा दिया करते थे।

परंतु जब करण द्वारा अपने आप को एक सूत पुत्र के रूप में उनके सामने रखा गया तब उन्होंने करण को अपना शिष्य बनाने के लिए मान गए हालांकि उस समय करण भी यह नहीं जानते थे कि वह एक क्षत्रिय कुल से संबंध रखते हैं।

इसी प्रकार कराना अपनी शिक्षा को ग्रहण करने में लगे हुए थे तब एक दिन दोपहर के समय गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करते समय भगवान परशुराम ने आराम करने के बारे में सोचा और वह करण की गोद में ही सरल रखकर विश्राम करने लगे।

इसी बीच वहां एक बिच्छू खा गया जो करण की जांग पर टैंकर मारने लगा परंतु फिर भी गुरु के विश्राम में खलल ना हो इसलिए करण को इस दुख को सहने रहे परंतु इसके बाद जब उनका रक्त निकलना शुरू हुआ और वह जाकर भगवान परशुराम के संपर्क में आया तब परशुराम की जी की नींद खुल जाती है।

इस बार भगवान परशुराम करण से बहुत ज्यादा क्रोधित हो जाते हैं और मैं उनसे कहते हैं कि तुमने मुझसे झूठ बोला है क्योंकि एक ब्राह्मण या सूत पुत्र इतनी सहनशक्ति नहीं रखता है और तुम यकीनन ही एक छतरी हो और तुम ने जानबूझकर अपनी जाति छिपाई एवं कपट के साथ मेरी विद्या को हासिल किया है।

इसके बाद भगवान परशुराम ने क्रोध में आकर कर्ण को यह श्राप दिया कि जब तुम्हें मेरी विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी अब तुम्हें यह याद नहीं आएगी और तुम इसके बारे में भूल जाओगे और उनके श्राप का प्रभाव ऐसा रहा कि महाभारत के युद्ध के अंतिम चरण में जब करण का अर्जुन के साथ सामना हुआ तो एक परिस्थिति में वह अपनी सारी विद्या को भूल गए और अर्जुन के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए।

भगवान परशुराम का जीवन परिचय | Bhagwan Parshuram Biography In Hindi‌

परशुरामजी की जयंती (Parsuram Jayanti)

परशुराम जी की जयंती हिंदू धर्म में एक विशेष महत्त्व रखती है जो कि भगवान विष्णु के छठ में अवतार के पृथ्वी पर आगमन के उत्साह में मनाई जाती है और यह हर वर्ष अक्षय तृतीया के दिन मनाई जाती है और ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान परशुराम ने जन्म लिया था।

इस दिन परशुराम भगवान के नाम पर उनके मंदिरों में हवन पूजन का आयोजन किया जाता है और सभी लोग बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लेते हैं।

कुछ लोग इस दिन उनके लिए उपवास रखकर एवं वीर एवं निडर पुत्र की कामना करते हैं और मानते हैं कि ऐसा करने से उनका एक पुत्र को परशुराम जी का आशीर्वाद प्राप्त होगा और वह भी उनकी तरह ही पराक्रमी और बुद्धिमान होगा।

परशुराम कुंड कहां है? (Parshuram Kund Story)

परशुराम कुंड अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित है और ऐसी मान्यता है कि इस कुंड में ही भगवान परशुराम ने अपनी माता का वध करने के बाद स्नान करके अपने पाप का प्रायश्चित किया था।

FAQ:

भगवान परशुराम के कितने शिष्य थे?

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान परशुराम के शिष्यों में पितामह भीष्म गुरु द्रोण एवं करण शामिल थे।

भगवान परशुराम के माता पिता कौन थे?

भगवान परशुराम के माता पिता ऋषि जमदग्नि और रेणुका थे।

भगवान परशुराम की जाति क्या थी?

भगवान परशुराम ब्राह्मण जाति से संबंध रखते थे।

भगवान परशुराम को और कितने नामों से जाना जाता है?

भगवान परशुराम के जन्म का नाम अनंताराम था परंतु भगवान शिव के द्वारा वस्त्र परसों के सदैव उनके साथ होने के कारण उन्हें परशुराम कहा जाने लगा।

भगवान परशुराम का जन्म कब और कहां हुआ?

भगवान परशुराम का जन्म मान्यताओं के अनुसार वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था और इसी दिन हर वर्ष उनकी जयंती भी मनाई जाती है।

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निष्‍कर्ष

मैं आशा करता हूं की आपको “भगवान परशुराम का जीवन परिचय (Bhagwan Parshuram Biography In Hindi) पसंद आया होगा। अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया है तो कमेंट करके अपनी राय दे, और इसे अपने दोस्तो और सोशल मीडिया में भी शेयर करे।

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